Salphas Poisoning Treatment: सल्फास जहर से अब नहीं जाएगी जान! PGI चंडीगढ़ के डॉक्टरों ने जगाई नई उम्मीद

सल्फास जहर से अब नहीं जाएगी जान! PGI चंडीगढ़ के डॉक्टरों ने जगाई नई उम्मीद, जानें किस तरह से हो सकेगा उपचार, पढ़िए

PGI Chandigarh Claims To Save Lives In Salphas Poisoning Treatment

PGI Chandigarh Claims To Save Lives In Salphas Poisoning Treatment

Salphas Poisoning Treatment: भारत में हर साल सैकड़ों लोग घरेलू कलेश और तनाव में आकर सल्फास (कीटनाशक) ज़हर निगल अपनी जान गंवा देते हैं। लेकिन अब उम्मीद है कि सल्फास जहर निगलने के बाद भी किसी व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है। दरअसल सल्फास जहर से जिंदगी बचाने की दिशा में PGI चंडीगढ़ के डॉक्टरों ने एक नई उम्मीद जगाई है और इस पर किए गए अपने अध्यन में यह पाया है की कैसे समय रहते इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन (आईएलई) थेरेपी सपोर्ट देकर ऐसे घातक ज़हर के गंभीर मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

बता दें कि यह ज़हर देश में सबसे घातक माने जाने वाले ज़हरों में शामिल है, जिसकी मृत्यु दर अब तक बेहद अधिक रही है। यानि इस जहर को निगलने वाले लोगों की मृत्यु दर लगभग 100% ही है। लेकिन अब पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआई) चंडीगढ़ के डॉक्टरों ने एल्यूमिनियम फॉस्फाइड यानि सल्फास जहर के इलाज में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर ली है। पीजीआई के डॉक्टरों ने जान बचाने की नई राह बनाई है। पीजीआई के आंतरिक चिकित्सा विभाग द्वारा किए गए इस अध्ययन में पहली बार यह सिद्ध हुआ है कि इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन (आईएलई) थेरेपी सल्फास ज़हर से पीड़ित मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है।

यह शोध इस घातक ज़हर के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। शोध के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे। जिन मरीजों को मानक उपचार के साथ इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन दिया गया, उनमें मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी, गंभीर मेटाबॉलिक एसिडोसिस में तेज़ सुधार, रक्तचाप में स्थिरता और हृदय संबंधी जटिलताओं से बेहतर रिकवरी देखी गई। अध्ययन में यह भी सामने आया कि इस थेरेपी का समय पर उपयोग मरीज की हालत को निर्णायक रूप से बेहतर बना सकता है। इस नई थेरेपी की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुलभता और कम लागत है।

इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन पहले से ही देश के अधिकांश अस्पतालों जिला अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तक में उपलब्ध है। इससे दूर-दराज़ और ग्रामीण इलाकों में भी सल्फास ज़हर से पीड़ित मरीजों की जान बचाई जा सकेगी, जहां इस तरह के मामलों की संख्या सबसे अधिक है। इस महत्वपूर्ण शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित जर्नल ‘यूरोपियन रिव्यू ऑफ मेडिकल एंड फार्माकोलॉजिकल साइंसेज़’ में प्रकाशित किया गया है, जिससे उत्तर भारत की एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या को वैश्विक मंच पर पहचान मिली है।

यह अध्ययन पीजीआई के आंतरिक चिकित्सा विभाग में प्रो. संजय जैन, डीन (अकादमिक) एवं विभागाध्यक्ष, के मार्गदर्शन में किया गया। गंभीर रूप से बीमार मरीजों के उपचार में उनकी विशेषज्ञता और नेतृत्व इस शोध की सफलता में अहम रहा। शोध को पीजीआई की मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च सेल (एमई आरसी) से वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ। इस रैंडमाइज़्ड क्लीनिकल स्टडी के मुख्य शोधकर्ता डॉ. मंदीप सिंह भाटिया, एसोसिएट प्रोफेसर (आंतरिक चिकित्सा) रहे, जबकि डॉ. सौरभ चंद्रभान शारदा सह-शोधकर्ता थे। अध्ययन में विभाग के अन्य चिकित्सक भी शामिल रहे।

विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों में अनाज संरक्षण के लिए एल्यूमिनियम फॉस्फाइड के व्यापक उपयोग के कारण इस ज़हर से होने वाली मौतों का बोझ सबसे अधिक है। ऐसे में यह शोध इन राज्यों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह उपलब्धि न केवल चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में मील का पत्थर है, बल्कि किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए भी जीवनरक्षक साबित हो सकती है। खासतौर पर ग्रामीण और छोटे शहरों में जहां ऐसे मामले आम हैं।

रिपोर्ट- साजन शर्मा